sandhya/suraj


via Gray Flannel
शाम हो चली है...
दिन भरा का थका सूरज, संध्या को आपने आलिंगन में ले
अन्धकार के घने जंगल  में, डूब  जायेगा .. 
रात भर व्योम वासी ढूँढ़ते रहेंगे ... 
संध्या को, सूरज को
सूरज को, संध्या को...

परन्तु उस स्याह जंगल में
व्योम वासियों के दीपक की रौशनी नहीं पहुँचती
कुछ सुनायी नहीं देता
होती है सिर्फ एक भीनी सी खुशबू
और एक ठहरी सी मादकता

एक जादू
जो सिर्फ चढ़ता ही जाता है
और हर रात के अंत में, एक अधूरी कहानी की तरह अधूरा सा रुक जाता है

अगली सुबह , चिड़ियों की चह चाहट के आगमन में
सूरज उषा के कपोलों पर चुम्बन ले
उषा को शर्म से लाल कर
आगे बढ़ता है

काल चक्र की भाँती, संध्या उसका अतीत बन चुकी होती है...
इंतज़ार... संध्या की अकेली सचाई है...


Copyright © Neerja Yadav

p.s: for those of you, who are not versed with devnagri script (hindi) - am working on the translation.


2 comments:

Margie said...

Loved it, Neers and espeacilly these lines ...

A magic
Which is the only soar
And at the end of every night, like an incomplete story incomplete stops

Hope you are doing well and you are experiencing joyful days!

Margie x

Neers said...

why, thank you, margie! wonderful friends, i have :)